यमुना के किनारे वृंदावन के उस छोटे से राधावल्लभ मंदिर में बिजली आज भी नहीं आती।
पिछले चालीस साल से शाम की आरती मिट्टी के दीयों से होती है। और पिछले बीस साल से उन दीयों को जलाने वाला कोई पुजारी नहीं, एक गायक है — गोपाल दास।
लोग उसे अंधा भजनिया कहते हैं। उम्र पचपन, आँखें बचपन में चेचक में चली गईं। गले में तुलसी की माला, हाथ में खड़ताल नहीं, सिर्फ आवाज। जब वो गाता है तो लगता है दीवारों से भी धूल झड़ जाती है।
गाँव वाले कहते हैं, “गोपाल गाए तो दीपक अपने आप जल उठते हैं।”
मैं पहले हँसता था। मैं वृंदावन नहीं, दिल्ली से आया था, डॉक्यूमेंट्री बनाने। मेरा कैमरा, मेरा माइक, मेरा तर्क। मुझे लगा ये कहानी अच्छी बी-रोल देगी। पर तीन शामों बाद मेरा तर्क चुप हो गया।
बचपन का सुर
गोपाल का जन्म बरसाना के पास अड़ींग गाँव में हुआ। बाप मजदूर, माँ गाती थी। आठ साल की उम्र में बुखार आया, आँखों की रोशनी गई। माँ ने रोते-रोते उसे कीर्तन मंडली में बैठा दिया।
उस्ताद ने कहा, “इसे राग सिखाओ, दुनिया नहीं देखेगा तो सुर देखेगा।”
गोपाल ने राग नहीं, भजन पकड़ा। सूरदास, मीरा, कबीर। वो गाता तो औरतें चूल्हा छोड़ कर सुनने आ जातीं। सोलह साल में शादी हुई, राधा नाम की लड़की से। राधा कहती, “तुम्हारी आवाज में दिया जलता है।”
1999 में यमुना में बाढ़ आई। राधा घाट पर कपड़े धो रही थी, बह गई। गोपाल किनारे बैठा गाता रहा, “मेरे तो गिरधर गोपाल…” लोगों ने कहा पागल हो गया।
वो पागल नहीं हुआ, मौन हो गया। तीन साल तक नहीं गाया। फिर एक दिन राधावल्लभ मंदिर के पुजारी ने उसे बुलाया, “बिजली नहीं है, आरती करनी है, कोई गाने वाला नहीं।”
गोपाल ने मना किया। पुजारी ने कहा, “राधा को दीया पसंद था न?”
उस शाम गोपाल ने पहली बार गाया।
पहली बार दीपक जले
पुजारी बताते हैं, उस दिन आँधी आई थी। मंदिर के सौ दीये बुझ गए। माचिस भीगी थी। पुजारी घबराया। गोपाल ने आँखें बंद कीं और मल्हार में “बरसाने वाली राधे” शुरू किया।
पहले अंतरे पर उसकी आवाज काँपी। दूसरे पर ठहरी। तीसरे पर जब वो तार सप्तक में गया — “राधे राधे” — तो सबसे पास वाले दीये की बाती फड़फड़ाई। पुजारी ने सोचा हवा। पर हवा नहीं थी।
फिर एक-एक करके, जैसे कोई अदृश्य हाथ बाती छू रहा हो, दीये जलने लगे। पहले पाँच, फिर बीस, फिर सौ। बिना तेल डाले नहीं, तेल तो था, पर आग नहीं थी। आग आवाज से आई।
पुजारी रो पड़ा। गोपाल गाता रहा, उसे पता भी नहीं चला।
उसके बाद हर शाम यही होने लगा। गोपाल गाता, दीये जलते।
मैं और मेरा कैमरा
मैं तीसरी शाम कैमरा लेकर बैठा। मैंने थर्मल कैमरा, साउंड मीटर, सब लगाया। सोचा ट्रिक पकड़ूँगा।
छह बजे आरती। पुजारी ने दीये रखे, बाती बुझी। गोपाल आया, जमीन पर बैठा। उसने तानपुरा नहीं छुआ, सिर्फ हाथ जोड़े।
उसने शुरू किया — राग दीपक नहीं, राग यमन। “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो…”
पहले दो मिनट कुछ नहीं। मीटर पर 65 डेसिबल। फिर वो “पायो” शब्द को खींचने लगा। आवाज छाती से नहीं, नाभि से आ रही थी। 85, 90 डेसिबल। मेरी छाती काँपी।
तभी पहला दीया जला। मैंने ज़ूम किया। बाती के पास कोई नहीं। फिर दूसरा, तीसरा। दस सेकंड में पचास दीये। लौ सीधी, जैसे हवा रुकी हो।
थर्मल कैमरे में दिखा, बाती का तापमान 210 डिग्री से 430 डिग्री तक एक सेकंड में गया। इग्निशन पॉइंट।
मैंने रिकॉर्डिंग रोकी। हाथ काँप रहे थे।
आरती के बाद मैंने पूछा, “बाबा, ये कैसे?”
गोपाल हँसा। आँखें नहीं थीं, पर हँसी में रोशनी थी। “बेटा, आग बाहर नहीं जलती। आग भीतर जलती है। जब भीतर जल जाए तो बाहर का दीया शरमा कर जल उठता है।”
मैंने कहा, “विज्ञान कहता है ध्वनि से आग नहीं लगती।”
उसने मेरा हाथ पकड़ा, अपने गले पर रखा। वाइब्रेशन महसूस हुआ। “विज्ञान ध्वनि नापता है, भक्ति ध्वनि को सुनती है। मैं राधा के लिए गाता था, अब राधा में गाता हूँ। फर्क समझो।”
असली रहस्य
अगले दिन मैंने उसकी झोपड़ी देखी। एक कोने में राधा की फोटो, उसके सामने एक बुझा हुआ दीया। रोज़ रात को गोपाल उसी दीये के सामने गाता है, अकेले।
उसने बताया, “जिस दिन राधा गई, मैंने कसम खाई थी, अब कोई दीया मेरे सामने बुझा नहीं रहेगा। मैं आँख से नहीं देख सकता, पर आवाज से देख लेता हूँ कहाँ अंधेरा है।”
उसकी आवाज में दर्द नहीं, धन्यवाद था। वो हर सुर में राधा को नहीं पुकारता, राधा को धन्यवाद देता कि उसने उसे सुनना सिखाया।
एक दिन मंदिर में बड़ा उत्सव था। जिलाधिकारी आए, लाइटें लगीं, जनरेटर आया। पुजारी ने कहा, “आज बिजली से आरती होगी।”
गोपाल चुपचाप पीछे बैठ गया। जनरेटर फेल हो गया। अंधेरा। लोग हँसे। डीएम ने कहा, “मोमबत्ती लाओ।”
तभी गोपाल ने बिना कहे गाना शुरू किया — “दीपक राग”। वो राग जिसे तानसेन ने गाया था और दीये जले थे। आज तक कोई नहीं गाता, डरते हैं।
गोपाल डरा नहीं। उसने आँखें बंद कीं। पहला स्वर लगा तो मंदिर के बड़े झाड़-फानूस के सौ बुझे बल्ब नहीं, नीचे रखे मिट्टी के हजार दीये एक साथ भभक उठे। लोग चीख पड़े।
डीएम ने माइक छोड़ा, हाथ जोड़ लिए।
गाना खत्म हुआ तो गोपाल गिर पड़ा। बेहोश। डॉक्टर ने कहा, दिल कमजोर है, ज्यादा जोर मत लगाओ।
मैंने पूछा, “फिर क्यों गाया?”
उसने कहा, “क्योंकि आज अंधेरा सिर्फ मंदिर में नहीं था, लोगों के भरोसे में था। उन्हें लगा बिजली भगवान है। मुझे याद दिलाना था, भगवान आवाज है।”
आज
गोपाल अब भी हर शाम गाता है। दीये अब भी जलते हैं। मैंने डॉक्यूमेंट्री नहीं बनाई। मैंने कैमरा बेच दिया और एक छोटा तानपुरा खरीद लिया।
क्योंकि मैंने सीखा, भक्ति में डूबे गायक की आवाज से दीपक इसलिए जलते हैं क्योंकि वो आवाज तेल नहीं माँगती, वो खुद जलती है। जब कोई आदमी अपना सारा दुख, सारा प्रेम, सारी याद एक सुर में डाल देता है, तो वह सुर आग बन जाता है।
विज्ञान कहेगा, ये असंभव है। भक्त कहेगा, ये ही संभव है।
वृंदावन जाओ तो राधावल्लभ मंदिर के पीछे जाना। शाम छह बजे। वहाँ एक अंधा आदमी बैठा मिलेगा। उसके सामने सौ बुझे दीये होंगे।
वो गाएगा — “श्री राधे…”
और तुम देखना, पहले दीये की लौ काँपेगी, फिर ठहरेगी, फिर जल उठेगी। और उसके साथ तुम्हारे भीतर का कोई पुराना अंधेरा भी।